सरकार मोदी की बनेगी, जीतेंगे दिग्विजय

लेखक - अनिल चावला

मुझे सब्जी खरीदने का खूब शौक है। प्रति सप्ताह हाट जाता हूँ और बड़े मनोयोग से सब्जियां खरीदता हूँ। शनिवार की बात है। हाट में एक दुकानदार से खरीद रहा था। अचानक कानों में कुछ राजनीतिक चर्चा सुनाई दी। मैंने दुकानदार से अनायास पूछ लिया कि भैया सरकार किसकी बनवा रहे हो। वह निस्संकोच बोला कि सरकार तो मोदी जी की ही बनेगी। मैंने कहा चलो अच्छा है, और भोपाल में किसको जितवा रहे हो। वह उतने ही विश्वास से बोला कि भोपाल में तो दिग्विजय सिंह जी जीतेगें। मैंने कारण पूछा तो बोला कि अरे आलोक संजर (वर्तमान सांसद) ने कोई काम नहीं किया, अब भाजपा किस मुँह से वोट माँगेगी।

इस चुनाव का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है। एक ओर तो यह प्रतीत हो रहा है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार को पूरे देश में समर्थन मिल रहा है। और दूसरी ओर मतदाता राष्ट्रीय मुद्दों को दरकिनार कर स्थानीय नेताओं के चेहरा, चाल, चरित्र एवं काम को तवज्जो दे रहा है। मोदी के पक्के समर्थक मुट्ठी भर हैं और घोर विरोधी भी जनसंख्या का एक छोटा सा प्रतिशत है। आम मतदाता मोदी के भाषणों को सुनता है, राहुल को भी सुन लेता है। दोनों पर बने चुटकुलों पर मुस्कुरा लेता है और फिर अपनी दैनन्दिनी समस्याओं तथा स्थानीय समीकरणों पर विचार करने लगता है।

मोदी-शाह के धुंआधार प्रचार ने सबको यह विश्वास दिला दिया है कि अगली बार मोदी सरकार आयेगी। लेकिन जमीनी स्तर पर भाजपा दो गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। एक तो उसके वर्तमान सांसदों की पिछले पांच वर्ष की निष्क्रियता या अहंकार या दुर्व्यवहार है। दूसरी ओर उसके पास नेताओं की भारी कमी है। भाजपा एवं संघ की संगठनात्मक सोच यह है कि प्रत्येक सदस्य को कार्यकर्ता के रूप में काम करना चाहिए और जो कोई नेता बनने की महत्वाकांक्षा प्रदर्शित करे उसे कुचल देना चाहिए। प्रत्येक संसदीय क्षेत्र में भाजपा के पास कार्यकर्ताओं की भारी भरकम फौज है पर नेताओं का टोटा है।

एक पुरानी कहावत है कि मढ़ो दमामो ना बने सौ चूहे के चाम अर्थात नगाड़ा बनाने के लिए सौ चूहों के चमड़ों से काम नहीं चलता, उसके लिए भैंसे का ही चमड़ा चाहिए होता है। अब जिसको चूहे पालने का ही अनुभव हो वो तो भैंस के पाड़े से ही घबराता है, भैंसा तो सपने में भी आ जाए तो बेहोश हो जाए।

भाजपा में दमदारों को भगाने की पुरानी परम्परा और इतिहास है। इस चुनाव में पचहत्तर के अधिक की आयु के बहाने या पुराने सांसदों के थोक में टिकट काटने के नाम पर या खराब स्वास्थ्य के कारण एक बड़ी छटनी की गयी है या की जा रही है। इन सब का परिणाम यह हुआ है कि भाजपा में मोदी-शाह से अलग हट कर कुछ दिखाई नहीं दे रहा। आसमान में चमकते इन सितारों को साधारण मतदाता दूर से देखता है और या तो तारीफ़ करता या गाली देता है। पर वोट देते समय उसकी नज़र के सामने जो विकल्प होते हैं वह उनको तोलता है और अपना मन बनाता है।

अब यदि उसके सामने एक और दिग्विजय सिंह जैसा मजबूत व्यक्तित्व है और दूसरी और भाजपा के अनिर्णय की स्थिति है तो स्पष्ट है कि वह किस ओर झुकेगा। (यह लिखने तक भाजपा भोपाल में दिग्विजय के सम्मुख अपना प्रत्याशी तय नहीं कर पायी है। ) बात केवल भोपाल की नहीं है। कमोबेश पूरे भारत में भाजपा के प्रत्याशी अपनी व्यक्तिगत छवि के आधार पर चुनाव जीतने में अपने प्रतिद्वंदी के सम्मुख कमजोर हैं। उनको मोदी-शाह के करिश्मा, संघ के चुनाव संचालन और पार्टी की ब्रांड वैल्यू पर ही भरोसा है।

सवाल यह है कि क्या प्रत्याशियों की कमजोरियों पर मोदी का जादू भारी पड़ेगा या मोदी के गुणगान करते हुए मतदाता दिग्विजय को विजयी बना देगा?

अनिल चावला

१० अप्रैल २०१९

ANIL CHAWLA is an engineer (B.Tech. (Mech. Engg.), IIT Bombay) and a lawyer by qualification but a philosopher by vocation and an advocate, insolvency professional and strategic consultant by profession.
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Anil Chawla

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